Saturday, September 26, 2026

फिल्म ‘साँकल को अब तक मिल चुका है 45 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में सेलेक्शन

राजस्थान के जैसलमेर जिले के एक छोटे-से गांव खूती की ढाणी में बरसों पहले जन्मी एक सामाजिक कुरीति, आज भी सिनेमा के पर्दे पर लोगों को झकझोर रही है। फिल्म ‘साँकल’ उसी कुरीति और उसके भीतर दबी एक पीढ़ी की चुप्पी की कहानी है। देदिप्या जोशी के लेखन-निर्देशन में बनी यह फिल्म अब तक 45 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में सेलेक्ट हो चुकी है और 15 से ज्यादा अवॉर्ड्स अपने नाम कर चुकी है। यह इस बात का सबूत है कि सच्ची और तकलीफदेह कहानियां सरहदों के पार भी असर छोड़ती हैं।

स्टेज (STAGE) के को-फाउंडर एवं चीफ कंटेंट ऑफिसर प्रवीण सिंघल ने कहा, “‘साँकल’ जैसी फिल्में हमें याद दिलाती हैं कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने का जरिया भी है। यह फिल्म एक ऐसी सच्चाई को सामने लाती है, जिस पर बात करने से समाज अक्सर कतराता है, और यही वजह है कि इसे दुनिया भर के फेस्टिवल्स में इतनी सराहना मिली है। स्टेज का मकसद हमेशा से जमीन से जुड़ी, असरदार कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाना रहा है, और ‘साँकल’ इसी सोच को आगे बढ़ाती है।”

फिल्म में केसर और अबीरा की भूमिका में चेतन शर्मा और तनीमा भट्टाचार्य नजर आए, वहीं दिग्गज अभिनेता मिलिंद गुणाजी, हरीश कुमार और जगत सिंह ने भी अहम किरदार निभाए। फिल्म का लेखन और निर्देशन देदिप्या जोशी ने किया है, जबकि इसका निर्माण आनंद राठौर और देदिप्या जोशी ने मिलकर किया।

कहानी: रक्त की ‘शुद्धता’ के नाम पर बनी एक कुरीति

‘साँकल’ की कहानी की जड़ें एक असल सामाजिक प्रथा में हैं। गांव के लोग अपने बेटों का विवाह तो दूसरे गांवों की बेटियों से करते रहे, लेकिन रक्त की तथाकथित ‘शुद्धता’ के नाम पर धीरे-धीरे अपनी बेटियों का विवाह गांव से बाहर करना बंद कर दिया। समय के साथ जब ये बेटियां बड़ी होने लगीं, तो पंचायत ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने पूरे गांव की तकदीर बदल दी। गांव की जवान हो चुकी बेटियों की शादी गांव के ही छोटी उम्र के लड़कों से करा दी गई। इसी फैसले के इर्द-गिर्द बुनी गई है केसर और अबीरा की कहानी, जिसमें उम्र का फासला रिश्तों में एक ऐसी दरार बन जाता है, जो पीढ़ियों तक भरती नहीं। फिल्म बचपन, जिम्मेदारी, भरोसे और एक औरत के संघर्ष को गरिमा के साथ पर्दे पर उतारती है।

मौन सहमति की सामाजिक साज़िश

साँकल’ सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक मौन पर सवाल है, जो कुरीतियों को पनपने देता है। फिल्म बचपन बनाम जिम्मेदारी, महिला किरदार की चुप्पी और संघर्ष, और अंतरराष्ट्रीय पहचान पाने वाली एक देसी सच्चा, इन तीन धागों को साथ पिरोती है। बिना किसी अश्लीलता या सनसनी के, फिल्म एक संवेदनशील मुद्दे को गरिमा के साथ पर्दे पर उतारती है, जो इसे फेस्टिवल सर्किट में खास बनाता है।

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