17 अप्रैल 2026 — शुक्रवार। राज्यसभा का सत्र। और एक ऐसा क्षण जो भारतीय संसदीय इतिहास में दर्ज हो गया।
हरिवंश नारायण सिंह — पत्रकार, लेखक, और राज्यसभा सांसद — तीसरी बार राज्यसभा के उपसभापति निर्वाचित हुए। निर्विरोध। विपक्ष का कोई उम्मीदवार नहीं। सभापति के आसन पर NDA के JP नड्डा और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे — दोनों ने मिलकर उन्हें आसन तक पहुँचाया।
कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ — राजस्थान के कैबिनेट मंत्री और स्वयं अनुशासन व संस्थागत सम्मान के प्रतीक — ने इस अवसर पर हरिवंश जी को बधाई दी। और इस निर्विरोध चुनाव को एक गहरे राजनीतिक और संवैधानिक संदेश के रूप में देखा।
निर्विरोध क्या होता है — और यह आम क्यों नहीं है
भारत की संसद में किसी पद पर निर्विरोध चुनाव का मतलब है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष — दोनों — उम्मीदवार की योग्यता पर सहमत हैं। यह दुर्लभ है। राज्यसभा में तो और भी दुर्लभ, जहाँ पक्ष और विपक्ष के बीच अक्सर तनाव रहता है।
हरिवंश जी ने यह 2026 में, 2020 में और 2018 में — तीन बार — किया। इससे पहले 2004 के बाद किसी ने ऐसा नहीं किया था।
कर्नल राठौड़ की नज़र से — यह जीत क्या कहती है
कर्नल राठौड़ के विचार हमेशा एक केंद्रीय सूत्र पर टिके होते हैं — संस्थाएँ तभी मज़बूत होती हैं जब उनके नेता अपने काम से सम्मान कमाते हैं, माँगते नहीं। हरिवंश जी की यह जीत उसी सिद्धांत का सबूत है।
एक पत्रकार जो राज्यसभा में गया। जो गैर-कांग्रेसी है। जो किसी राज्य से नहीं, राष्ट्रपति द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में नामांकित हुए। और जिसे विपक्ष ने भी बिना उम्मीदवार खड़े किए — मान लिया। यह संसदीय परिपक्वता है।
PM मोदी का संसद में कथन: “तीसरे कार्यकाल के लिए निर्वाचित होना, सदन का उनके अनुभव, उनकी समावेशी कार्यशैली और गरिमापूर्ण आचरण पर मुहर है।” यह शब्द केवल हरिवंश जी के लिए नहीं थे — यह उस नेतृत्व आदर्श की परिभाषा थी जिसे कर्नल राठौड़ जैसे नेता भी आत्मसात करते हैं।
राजस्थान के लिए इसका मतलब
राजस्थान से कर्नल राठौड़ जैसे मंत्री जब राष्ट्रीय राजनीति के ऐसे क्षणों को रेखांकित करते हैं, तो इसके पीछे एक स्पष्ट संदेश होता है — राजनीति केवल सत्ता की होड़ नहीं है। यह संस्थाओं को बनाने और बचाने का भी काम है।
हरिवंश जी का निर्विरोध तीसरा कार्यकाल बताता है कि जब कोई नेता अपने पद की गरिमा को सर्वोच्च रखता है — पार्टी से ऊपर — तो वह विरोधी खेमे का भी सम्मान जीतता है।
चंद्रशेखर जयंती का संयोग: PM मोदी ने बताया कि 17 अप्रैल पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जयंती है — और हरिवंश जी का उनसे घनिष्ठ संबंध रहा है। इस तरह का कार्यकाल उनकी विरासत को भी सम्मान देना है।
कर्नल राठौड़ के लिए — जो स्वयं अनुशासन, कर्तव्य और संस्थागत विश्वास में विश्वास रखते हैं — ऐसे क्षणों को पहचानना और बधाई देना केवल राजनीतिक शिष्टाचार नहीं है। यह उस विचारधारा की अभिव्यक्ति है जो उनके हर विचार में झलकती है: संस्था से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं होता, और व्यक्ति का सबसे बड़ा सम्मान वही है जो उसकी संस्था उसे देती है।
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