भारत की लोकसभा में आज सिर्फ 78 महिला सांसद हैं। यानी लगभग 14%। यह वैश्विक औसत से भी कम है। रवांडा, मैक्सिको और नेपाल जैसे देश — जहाँ महिला कोटा पहले से लागू है — भारत से आगे हैं।
2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास हुआ — जिसने 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का कानून बनाया। पर यह कानून खुद अपने आप लागू नहीं हो सकता। इसे जनगणना और परिसीमन (delimitation) से जोड़ा गया है। और वह प्रक्रिया 2027-28 तक चलेगी — मतलब 2029 के चुनाव में शायद यह लागू ही न हो।
यही वह समस्या है जिसे कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने 23 अप्रैल 2026 को श्रीनगर प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलकर रखा।
सरकार ने क्या किया — और क्यों ज़रूरी था
16 अप्रैल 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए:
- संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक 2026 — 2011 की जनगणना के आधार पर तुरंत परिसीमन शुरू करने की शक्ति
- परिसीमन विधेयक 2026 — नया परिसीमन आयोग बनाने का तंत्र
- केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक 2026 — J&K सहित UTs में महिला आरक्षण लागू करना
इन तीनों का लक्ष्य था: 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करो, लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करो, और 2029 से पहले 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करो।
राठौड़ ने क्या कहा — और क्यों यह अलग है
कर्नल राठौड़ ने श्रीनगर में स्पष्ट कहा: “2023 के कानून में लिखा था कि इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू किया जाएगा। यह खुद अपने आप लागू नहीं हो सकता।” विपक्ष का यह कहना कि “कानून तो पास हो चुका है, अब क्या चाहिए?” — यह भ्रम है।
उन्होंने विपक्ष की OBC कोटे की माँग पर भी बात की: “OBC पर संसद में चर्चा हो सकती है, पर इसे कार्यान्वयन रोकने का कारण बनाना गलत है।” SC/ST महिलाओं के लिए तो 2023 के कानून में पहले से ही प्रावधान है।
17 अप्रैल 2026 की असफलता: संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक लोकसभा में गिर गया। पक्ष में 298, विपक्ष में 230 वोट — दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 की ज़रूरत थी, 54 वोट कम पड़े। नतीजा: महिला आरक्षण का लागू होना एक बार फिर 2034 तक खिसक सकता है।
कर्नल राठौड़ के विचार हमेशा एक बात कहते हैं — संस्थाएँ तभी मज़बूत होती हैं जब सही लोगों को सही जगह मिले। भारत की संसद में महिलाओं का 33% प्रतिनिधित्व उसी दिशा का एक कदम है। इस मुद्दे पर कर्नल राठौड़ के ताज़ा अपडेट यहाँ देखें।